नई दिल्ली: जीवन रक्षक दवाओं की बढ़ती कीमत और मरीजों की पहुंच सुनिश्चित करने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे के लिए देशव्यापी दिशानिर्देश जारी करने पर विचार करेगा।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला केरल की एक ब्रेस्ट कैंसर पीड़ित महिला की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। एर्नाकुलम निवासी महिला ने जून 2022 में केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने अपनी याचिका में बताया था कि ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जीवन रक्षक दवाएं रिबोसिक्लिब (Ribociclib) और एबेमासिक्लिब (Abemaciclib) इतनी महंगी हैं कि उन पर हर महीने करीब 1.5 लाख रुपये खर्च होते हैं।
महिला ने अदालत को बताया था कि केवल वही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में कैंसर मरीज इन दवाओं का खर्च उठाने में असमर्थ हैं, जिससे उनका इलाज प्रभावित होता है। हालांकि, याचिका दायर करने के कुछ महीनों बाद, वर्ष 2022 के अंत में उनकी मृत्यु हो गई।
महिला की मौत के बाद भी जारी रही सुनवाई
याचिकाकर्ता की मृत्यु के बावजूद केरल हाई कोर्ट ने इस मुद्दे को जनहित और जीवन के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय मानते हुए सुनवाई जारी रखने का फैसला किया। हाई कोर्ट ने इसे स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामला बनाकर आगे बढ़ाया।
जनवरी 2023 से अब तक यह मामला 57 बार सुनवाई की सूची में शामिल हुआ, लेकिन किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सका। सुनवाई में लगातार देरी को देखते हुए अब सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं इस मामले में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केरल हाई कोर्ट से लंबित मामले की जल्द सुनवाई कर आदेश पारित करने का अनुरोध किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि जीवन रक्षक इलाज से जुड़ी याचिका का फैसला याचिकाकर्ता के जीवित रहते नहीं हो पाता, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में केवल व्यक्तिगत राहत ही नहीं, बल्कि व्यापक सार्वजनिक हित भी जुड़ा होता है।
अनुच्छेद 21 से जुड़े मामलों पर बनेगी व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले की सुनवाई करते हुए इस बात पर भी विचार करेगा कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से जुड़े मामलों की देशभर में समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए क्या दिशानिर्देश जारी किए जा सकते हैं।
माना जा रहा है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता और उनकी वहनीयता (Affordability) के मुद्दे पर महत्वपूर्ण होगा, बल्कि जीवन के अधिकार से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए भी एक नई न्यायिक व्यवस्था की दिशा तय कर सकता है।